आज का चिंतन # 347
तुम मुझे यूं भुला न पाओगे…
एक गीत की पंक्तियां है कि
तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे
गीत अर्थात सुर, ताल, लय और एक प्रसन्नता का भाव; और गुनगुनाना अर्थात उस लयात्मक आह्लाद में स्वयं को भिगो देना, बह जाना और खुद को भूल जाना।
संबंध…
हम दूसरों से जुड़ पाते हैं, परस्पर व्यवहार और उससे उपजे भाव के कारण। व्यवहार बदलता रहता है, भाव भी बदलते रहते हैं और उसके प्रभाव हमारे संबंधों पर पड़ते रहते हैं। किंतु एक बार निस्वार्थ संबंध स्थापित हो गया तो वह स्थाई हो जाता है। स्वार्थ के संबंध सीमित उद्देश्य और सीमित समय के लिए होते हैं।
कमाई…
जीवन में धन, संपत्ति इत्यादि जो हम कमाते हैं, वह खो सकता है, मिट सकता है; लेकिन जो संबंध हम कमाते हैं, वह चिरस्थाई होते हैं। संबंधों की शक्ति, मनोभाव की शक्ति है और यह भौतिक संपत्ति से कहीं अधिक मूल्यवान है, लाभदायी है, हितकारी है।
क्या करें…
जीवन में संबंधों को निभाना एक परस्पर जिम्मेदारी है किंतु उसे अपना दायित्व समझते हुए यथासंभ सचेत और जागरूक रहकर, प्रतिदिन थोड़ा सा समय और ऊर्जा, संबंधों को बनाने में, उन्हें सहेजने में और उन्हें सुदृढ़ करने में अवश्य लगाएं, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
मंगलवार 24 मार्च 2026
नागपुर
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