आज का चिंतन # 343
यदि वह होता तो…
जीवन यात्रा दुख और सुख की धूप और छांव में चलती रहती है।
कभी मन जब आहत होता है, निराश होता है, दुखी होता है;
तब हमें ऐसे व्यक्ति का स्मरण कर लेना चाहिए जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं, जिनसे हम प्रभावित होते हैं,
और फिर विचार करना चाहिए कि इस स्थिति में यदि वह होता तो क्या करता?
और तब शायद हमें अपने मन पर नियंत्रण करने का, दुख से बाहर निकलने का, बाहरी कारणों के अनावश्यक प्रभाव में से स्वयं को निकालने का, बेहतर उपाय मिल सकता है।
भावनाएं…
हम सब भावुक होते हैं, संवेदनशील होते हैं, और इसीलिए दूसरों के व्यवहार और बातों से कभी-कभी दुखी, आहत, निराश इत्यादि हो जाते हैं; और इस प्रकार से स्वयं को ही कष्ट पहुंचाते हैं।
परिपक्वता…
दूसरों की सोच, भाषा, व्यवहार इत्यादि पर हमारा नियंत्रण शून्य होता है और स्वयं पर यह शत प्रतिशत होता है; और यदि यह परिपक्वता हमारे अंदर है, तो दूसरों की बातों और व्यवहार से उत्पन्न हमारा दुख; नगण्य या न्यूनतम हो सकता है; और हम मन में स्थिर भाव रखते हुए, अनावश्यक दुख और पीड़ा से स्वयं को बचाए रख सकते हैं।
क्या करें…
अपने विचारों की दृढ़ता, व्यवहार की शालीनता और सोच की परिपक्वता के प्रति सदैव प्रतिक्षण जागरूक रहें, सचेत रहें।
दूसरों से अपनी अपेक्षाओं को न्यूनतम या शून्य कर लें।
किसी भी प्रकार के अप्रिय व्यवहार या वातावरण के अवांछित प्रभाव से स्वयं की दृढ़ इच्छा शक्ति से, यथाशीघ्र, स्वयं को बाहर निकाल लें और यथासंभव स्थितप्रज्ञ रहते हुए, अपने संपूर्ण आत्मविश्वास, उत्साह और ऊर्जा के साथ जीवन में आगे बढ़ें, निरंतर बढ़ते रहें, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
मंगलवार 10 मार्च 2026
नागपुर
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