आज का चिंतन # 342
सोचें… क्या और कितना…..
हम किसी भी क्षण विचारों से रहित कहां हो पाते हैं। विचार प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।
सोच एक सचेत, सक्रिय और उद्देश्यात्मक मानसिक प्रक्रिया है, जिसमें किसी विषय पर ध्यान केंद्रित किया जाता है; इसके विपरीत, विचार मन में आने वाली एक क्षणिक छवि, भाव या मानसिक सामग्री है, जो अक्सर स्वयं उत्पन्न होती है।
क्या सोचें… और क्या नहीं
हमारे जीवन का जो लक्ष्य है, जो कार्य हमें करने हैं, जिस दिशा में हमें जाना है, उस विषय में हम सोचें और प्रयत्न करें, उपाय ढूंढें और समाधान की दिशा में आगे बढ़ें। निरर्थक विषय और विचारों से स्वयं को बचाएं; व्यर्थ की बातों, कार्यों, संगत और चर्चा इत्यादि में ना पड़ें।
कितना सोचें…
जितना हमें कार्य करने के लिए, आगे बढ़ने के लिए, सक्रिय रहने के लिए आवश्यक है, केवल उतना ही सोचें क्योंकि आवश्यकता से अधिक सोच भय, शंका या निराशा इत्यादि को जन्म दे सकती है और इसलिए इससे हमें बचना चाहिए।
क्या करें…
सदैव सचेत और जागरूक रहकर, अपनी सोच और कार्यों पर नियंत्रण रखते हुए, सक्रिय रहते हुए, उत्साह बनाए रखें, और आत्मविश्वास बनाए रखें और निरंतर प्रयत्न करते रहें, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
शुक्रवार 6 मार्च 2026
नागपुर
।
Leave a comment