आज का चिंतन # 333
कार्य और व्यवस्था…
हमारा हर एक कार्य अधिकतर किसी न किसी व्यवस्था जैसे पारिवारिक, सामाजिक, कार्यालयीन या संस्थागत आदि के अधीन होता है (यदि वह निजी कार्य न हो तो) और इस प्रकार के कार्य के लिखित अलिखित नियम कायदे इत्यादि होते हैं जिनका समझदारी और जिम्मेदारी से पालन किया जाना अपेक्षित और आवश्यक होता है।
मैंने अपना काम कर दिया…
कोई भी कार्य, जो किसी भी व्यवस्था के अंतर्गत होता है उसमें कई सारे कार्यों की एक श्रृंखला होती है और हम उस श्रृंखला का एक छोटा सा हिस्सा ही होते हैं। हमारे कार्य की मात्रा, गुणवत्ता आदि उस श्रृंखला के स्वरूप और उपयोगिता के अनुरूप हो, यह सुनिश्चित करना हमारा कर्तव्य होता है।
संपूर्णता और परिपूर्णता…
हमें यह देखना होता है कि हमारे द्वारा किए गए कार्य से, व्यवस्था के उद्देश्य की समुचित रूप से प्राप्ति हो रही है अथवा नहीं; इसके लिए हमें अपने कार्य में संपूर्णता और परिपूर्णता को यथासंभव सुनिश्चित करना अनिवार्य होता है। हमारे कार्य में कोई भी कमी या चूक हमारे प्रदर्शन पर तो विपरीत असर डालती ही है; साथ ही साथ यह व्यवस्था को भंग या धराशाई करने का कारक भी सिद्ध हो सकती है।
क्या करें…
किसी भी कार्य में अपनी संपूर्ण दक्षता और क्षमता का उपयोग करें; उपलब्ध संसाधनों और मानवीय सहयोग लेने में संकोच न करें; ऐसी कोई कमी न छोड़े जिसके लिए बाद में पछताना पड़े और हर छोटे बड़े कार्य के लिए अपना सर्वस्व दें, सर्वोत्तम दें, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
शनिवार 10 जनवरी 2025
नागपुर
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