आज का चिंतन 331

आज का चिंतन # 331

प्राप्त और प्राप्य..

प्राप्त अर्थात जो हमें मिला है, किसी ने हमको दिया है, जैसे हमको सम्मान प्राप्त हुआ, धन प्राप्त हुआ, साधन और सुविधाएं प्राप्त हुई इत्यादि।
प्राप्य अर्थात जिसे हम प्राप्त कर सकते हैं अपनी शक्ति द्वारा, अपने कौशल द्वारा जैसे परीक्षा में सफलता, कार्य में प्रवीणता इत्यादि
और इस प्रकार जो कुछ भी हम अपने पराक्रम से, अपने कार्य से, अपनी ऊर्जा से प्राप्त करते हैं, उस के लिए हम कहते हैं कि यह हमने अर्जित किया है।

प्राप्त और अर्जित..
जो कुछ भी हमें स्वाभाविक रूप से प्राप्त हुआ है कदाचित उसमें हमारा श्रम शून्य या नगण्य हो;
किन्तु जो कुछ हमने अर्जित किया है, उसमें हमने भरपूर चेतना, ऊर्जा, श्रम लगाया है, संसाधनों का उपयोग किया है, कार्य की निरंतरता को बनाए रखा है।

शिकायत..
जो कुछ भी हमें प्राप्त है उसको लेकर हमारी इच्छा और ज्यादा, और ज्यादा पाने की होती है यद्यपि उसको अर्जित करने की क्षमता हमारी नहीं होती है तो हमें अपने अंदर शिकायत बनी रहती है कि काश हमें और ज्यादा प्राप्त हो जाता।
इस प्रकार की स्वयं की शिकायत पीड़ा ही देती है और इसका एकमात्र समाधान केवल यही है कि जो प्राप्त है वह पर्याप्त है इसको अच्छे से समझ लिया जाए।

योग्यता, पात्रता..
किसी भी प्राप्ति के लिए पात्र होना, योग्य होना आवश्यक होता है। इसीलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी योग्यता और पात्रता को निरंतर बढ़ाते रहें तो हमारी प्राप्तियां भी उसी अनुपात में बढ़ती रहेंगी। जो प्राप्त है वह पर्याप्त है का भाव मन में रहेगा तो शिकायत भी नहीं रहेगी। स्वयं को शिकायतों से बचाते हुए अपने कार्य में निरंतर संलग्न रहें, यही अभीष्ट होता है।

संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
बुधवार 24 दिसंबर 2025
नागपुर

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