आज का चिंतन # 326
बदलना या छोड़ना..
संबंधों में कई बार यह देखने में आता है कि हम दूसरे को बदलने का प्रयास करते हैं, उसे अपने हिसाब से ढालने का प्रयास करते हैं, अपनी इच्छा अनुसार उसे चलाने का प्रयास करते हैं, लेकिन यह कभी भी पूरी तरह संभव नहीं होता है और फलस्वरुप हमारे संबंधों में खटास या दुराव आने लगता है।
कितना, कैसे संभव है..
दूसरों के मूल स्वभाव को समझना आवश्यक होता है। उसमें बदलाव, केवल उसकी स्वयं की अनुभूति से ही आएगा, दूसरे के बतलाने से नहीं आएगा। हां, हम अपनी बातों और अपने आचरण से अपनी इच्छा और अपेक्षा को प्रदर्शित कर सकते हैं लेकिन उसकी पूर्ति किस तरह से, और किस मात्रा में होगी, यह प्रकृति पर ही निर्भर करता है, इस पर हमारा कोई वश नहीं होता है।
छोड़ना…
वह अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
यदि व्यक्ति महत्वपूर्ण है तो बात को छोड़ दीजिए और यदि बात महत्वपूर्ण है तो व्यक्ति को छोड़ा जा सकता है, यह प्राथमिकता हमें ही तय करनी होती है।
क्या करें..
संबंधों को अटूट, स्थिर या संतुलित रखते हुए, उचित मानसिकता के साथ यथोचित व्यवहार करते हुए, जीवन में आगे बढ़ते रहें, बढ़ाते रहें, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
शुक्रवार 5 दिसंबर 2025
नागपुर
।
Leave a comment