आज का चिंतन 325

आज का चिंतन # 325

बात नहीं थी..

एक ग़ज़ल का शेर है कि
जिस्म की बात नहीं थी, उनकी रूह तक जाना था…
जिस्म यानी बाहरी आवरण और रूह यानी अंतरात्मा, चेतना।
बाहरी दिखावे पर लोग बहुत ज्यादा पैसा, ऊर्जा, समय खर्च करते हैं, लेकिन अपनी आत्मा और चेतना की ओर कदाचित उतना ध्यान और कार्य नहीं करते हैं।

प्रभाव…
दूसरों पर हमारा अच्छा प्रभाव पड़े,
इसकी चेष्टा और प्रयत्न खूब होता है।
ध्यान देने योग्य है कि हमारे स्वयं की सोच, विचारशक्ति, बातचीत, आचरण और व्यवहार से हमारा प्रभाव दूसरों पर स्वाभाविक रूप से पड़ता है, इसके लिए हमें अलग से कोई यत्न करने की आवश्यकता नहीं होती है।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों का प्रभाव, जाने अनजाने ही, हम पर निरंतर पड़ रहा है, इसकी चेतना, जागृति होना हमारे लिए बहुत आवश्यक होता है और इसीलिए सत्संगति पर बल दिया जाता है।
आज के समय में कुसंग और कुप्रभाव से स्वयं को बचा लेना बहुत बड़ी उपलब्धि है।

क्या करें…
स्वयं पर निरंतर, प्रतिक्षण कार्य करें
अर्थात स्वयं की सोच में, कार्य करने की पद्धति में, व्यवहार में, उत्कृष्टता और आचरण में पवित्रता और शुचिता के प्रयास बनाए रखें, यही अभीष्ट होता है।

संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
बुधवार 3 दिसंबर 2025
नागपुर

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