आज का चिंतन # 323
तेरे घर में…
फिल्म में एक डायलॉग सुनते थे कि तेरे घर में मां बहन नहीं है क्या..
इस कथन का एक अभिप्राय यह समझ में आया कि दूसरे की सोच में यह बात लाना कि इस स्थिति में तुम्हारा कोई अपना होता तो तुम क्या सोचते और क्या करते..
मनुष्य अपनी शक्ति के दंभ और अहंकार में वह दुर्व्यवहार, गलती या अन्याय कर जाता है जो वह स्वयं के लिए कभी नहीं चाहेगा।
न्याय की सोच यह भी होती है कि यदि हम या हमारा कोई, इस स्थिति में होता तो हम क्या चाहते और क्या निर्णय लेते।
आत्मावलोकन…
गालिब का एक मशहूर शेर है कि
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे आगे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे
दूसरों के अवगुण और बुराइयां देखने से अच्छा है कि हम स्वयं की ही देख लें और उन्हें सुधार लें
सावधानी..
एक डायलॉग यह भी था कि जिनके खुद के घर शीशे के बने होते हैं, वह दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते
हमें सदैव सजग और सचेत रहना होता है कि हम ऐसी कोई हरकत न करें जो हम पर ही भारी पड़ जाए।
क्या करें..
जो दूसरों को इत्र बांटते हैं उनके हाथों में खुशबू रह जाती है
तो हम यथासंभव परोपकार, भलाई और कल्याण की सोच रखें और उसके अनुसार निरंतर कार्य करते रहें, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
2025
नागपुर
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