आज का चिंतन # 319
अनावश्यक सत्य वचन…
यह विषय इस बात से संबंधित है कि हम लोग संबंधों में, आपसी व्यवहार और बातचीत में, सोशल मीडिया इत्यादि में पूर्व में कभी भी कहीं भी, जो हो चुका है, घट चुका है, उसके बारे में ऐसी बातें करते हैं जो सत्य तो हैं लेकिन कतई अनावश्यक होती हैं यदि इससे निराशा, द्वेष इत्यादि ही उत्पन्न होते हैं
जबकि आवश्यकता इस बात की होती है कि आपसी बातों में ऐसे तत्व सम्मिलित हों जिससे सकारात्मक प्रभाव की, उन्नति और प्रगति की, आपसी तालमेल की और सहयोग की दिशा प्रदीप्त हो।
सत्य किंतु व्यर्थ..
पूर्व में घटित बहुत कुछ ऐसा होता है जिसके प्रति हमारा दृष्टिकोण दूसरों से भिन्न होता है, पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकता है और वर्तमान के संदर्भ में निरापद हो सकता है। अतः आवश्यकता इस बात की होती है कि हमारे द्वारा वर्तमान क्षण के और परिस्थिति के अनुसार उचित भाषा में, उचित रीति से सार्थक, सकारात्मक और समाधानमूलक बातचीत की जाए।
अपने-अपने सत्य..
भौतिक नियमों की सत्यता के सापेक्ष, व्यवहारिक धरातल पर, सभी के अपने-अपने सत्य होते हैं जो कि उनके अनुभवों और उनकी पारिवारिक, शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि इत्यादि के अनुसार होते हैं, इसीलिए वह सत्य अन्य सभी के समान नहीं हो सकते हैं, इस बात की समझ अवश्य होनी चाहिए।
आवश्यकता..
आवश्यकता केवल इस बात की होती है कि चर्चा में यथासंभव मौलिक चिंतन को प्रस्तुत किया जाए, दूसरों के विचारों और बातों का पूर्ण सम्मान हो, चाहे हम उससे सहमत हों अथवा नहीं। अपनी बात को विनम्रता से रखा जाना ही यथेष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
बुधवार 12 नवंबर 2025
नागपुर
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