आज का चिंतन 310

आज का चिंतन #310

मान्यता और स्वीकार्यता…

स्वीकार्यता अर्थात जो जहां है, जैसा है
उसके अस्तित्व को, उसके स्वरूप को, उसके व्यक्तित्व को, उसी रूप में, सहजता पूर्वक, बिना किसी आंतरिक विरोध के, स्वीकार कर लेना। स्वीकार्यता का अर्थ उसकी बातों को, उसके सिद्धांतों को हमने पूरी तरह मान लिया है, ऐसा नहीं होता है
लेकिन इसका अर्थ उसकी प्रकृति और उसकी मौलिकता को समझ कर
उसके प्राकृतिक स्वरूप को जस का तस स्वीकार कर लेना होता है
जैसे हम प्रकृति के अन्य अवयवों अर्थात पेड़, पौधे, नदी, पहाड़, पशु, पक्षी इत्यादि को सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं।

मान्यता..
मान्यता प्राप्त विद्यालय, विश्वविद्यालय इत्यादि होते हैं, जहां निर्धारित प्रावधानों और मापदंडों का पालन होने पर, कोई सक्षम प्राधिकारी उन्हें शर्तों के अधीन मान्यता प्रदान करता है।
किसी व्यक्ति की बातों और सिद्धांतों को मान्यता देने, या नहीं देने का अधिकार, हमारे अंदर निहित होता है।
उस व्यक्ति का प्रस्तुतिकरण एक ओर होता है
और उसे मान्यता प्रदान किया जाना, दूसरी ओर पूर्णतया हमारा निजी निर्णय होता है।

समझ अपनी अपनी..
हर व्यक्ति अपनी बात को दूसरों के द्वारा पूर्ण समर्थन दिए जाने का, मान्यता दिए जाने का अभिलाषी होता है।
किसी बात को कितनी मान्यता देनी है इसका निर्णय दूसरे व्यक्ति का अधिकार होता है और इस प्राकृतिक व्यवस्था के बारे में दोनों को स्पष्टता होनी चाहिए, अन्यथा विरोध उपजता है।

क्या करें..
स्वीकार्यता और मान्यता के स्पष्ट भेद को समझते हुए हमारी सहज स्वीकार्यता बनी रहे, मान्यता का दबाव ना महसूस हो, और अपनी बात को प्रकट करने का, प्रस्तुत करने का, पूर्ण आत्मविश्वास हो, अभ्यास हो, यही अभीष्ट होता है।

संजय अग्रवाल
संपर्क संवाद सृजन समाधान
9406717823
सोमवार 15 सितंबर 2025
नागपुर

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