आज का चिंतन 307

आज का चिंतन #307

प्रेम समन्वय और स्वीकार्यता…

किसी ने कहा कि आप हिंदी लिखते समय अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग ना करें, क्योंकि मुझे हिंदी से प्रेम है।
तो दिमाग में कौंधा कि क्या प्रेम समन्वय और स्वीकार्यता से रहित है।

एकाधिकार…
प्रेम एकाधिकार चाहता है तो क्या शेष अस्तित्व को नकार दिया जाना चाहिए? प्रेम सभी से हो तो वह देवत्व कहलायेगा लेकिन वास्तविक जीवन में प्रेम कुछ से ही होता है, चाहे वह व्यक्ति, वस्तु हो या कोई भाव, कौशल, विधि इत्यादि हो। और शेष से हमें या तो समन्वय स्थापित कर लेना होता है या उनके प्रति सहज स्वीकार्यता का भाव रखना होता है। अन्यथा विरोध सदैव अवरोध ही उत्पन्न करेगा।

समन्वय…
किन्हीं भी दो व्यक्तियों में भाषा, विचार, आचरण, व्यवहार इत्यादि का अंतर होता ही है और परस्पर समन्वय करके ही साथ-2 चला जा सकता है, आगे बढ़ा जा सकता है, इस सत्य के प्रति हमारी समझ और जागरूकता अवश्य होनी चाहिए।

स्वीकार्यता…
स्वीकार्यता का अर्थ, दूसरे के प्राकृतिक, मौलिक स्वरूप के प्रति हमारी समझ और हमारा विरोध रहित होना होता है।
जैसे प्रकृति के सभी अवयव आपस में परस्पर स्वीकार्यता से रहते हैं, चलते हैं वैसे ही हम दूसरे मनुष्य के प्रति भी सहज और प्राकृतिक स्वीकार्यता को लेकर चलें, यही जीवन में अभीष्ट होता है।

संजय अग्रवाल
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सोमवार 25 अगस्त 2025
नागपुर

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