आज का चिंतन #285
*सत्य कैसे कहें…*
सत्य बोलने के लिए सहजता, सरलता, निर्मलता और आत्म बल की आवश्यकता होती है। लाभ हानि का गणित सत्य के स्वरूप को बदल देता है। डर अथवा स्वार्थ का प्रभाव, सत्य के प्रस्तुतिकरण पर अवश्य पड़ता है।
*रुकावट…*
सत्य बोलने में सबसे बड़ी रुकावट हमारे मन की आशंकाएं होती हैं कि लोग क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे, मेरी बातों को किस तरह लेंगे और फिर उससे हमारे आपसी संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह डर भी होता है कि सत्य हमें अनावृत्त कर देगा, जबकि हम सुविधाजनक आवरण में छुपे रहना चाहते हैं।
*अपने अपने सत्य…*
वैज्ञानिक तथ्यों की सत्यता के अलावा अन्य सभी सत्य व्यक्तिगत समझ, रुचि, प्राथमिकता, स्वार्थ, प्रकृति और प्रवृत्ति इत्यादि पर आधारित होते हैं। और इसीलिए उनमें सापेक्ष अंतर होता ही है। एक तरफ से एक व्यक्ति को जो 6 लिखा हुआ दिखाई दे रहा है वही दूसरी ओर से दूसरे को वह 9 लिखा हुआ दिखाई देता है।
*क्या करें…*
अधिकतर हर व्यक्ति स्वयं को ही सदैव सही समझता है। वह गलत है या सही नहीं है, यह बतलाने, समझाने, मनवाने में अपना समय और ऊर्जा नष्ट नहीं करना चाहिए।
हर किसी को अपनी सच्चाई पता होती है। हम अपनी बात प्रस्तुत मात्र ही कर सकते हैं और यही संभव एवं अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
9406717823
*संपर्क संवाद सृजन समाधान*
मंगलवार 3 जून 2025
नागपुर
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