आज का चिंतन #284
रिश्तों को बचाना…
जीवन में कुछ रिश्ते बने हुए होते हैं जैसे कि मां-बाप, जीवनसाथी, बच्चे, रिश्तेदार, पड़ोसी इत्यादि और कुछ रिश्ते बनाए जाते हैं जैसे मित्र, विभागीय सहकर्मी, सामाजिक समूह के व्यक्तियों से संबंध इत्यादि।
रिश्तों की शक्ति…
यदि रिश्तों में सहयोग की भावना, विचारों में समानता, समर्पण का भाव होता है तो हमें अपने अंदर उन रिश्तों की वजह से शक्ति का, सबलता का अनुभव होता है। वहीं दूसरी ओर यदि उनमें असहमति, असहयोग, विरोध इत्यादि का भाव होता है तो हमें अपने मन में क्लेश, विषाद, अप्रियता, दूरी और संघर्ष इत्यादि का अनुभव होता है।
कैसे निभाएं…
ऐच्छिक रिश्तों को निभाना या छोड़ देना या उनकी सीमा तय करना, पूर्णतया हमारे नियंत्रण में होता है किंतु अनिवार्य रिश्तों को उचित रूप से निभाने का कौशल हमें विकसित करना होता है। सामने वाले की इच्छा, क्षमता को समझते हुए सदैव अपनी परिपक्वता से हमें व्यवहार करना होता है। विवाद की स्थितियों को यथासंभव टालते हुए, न्यूनतम सहमति की अवस्था को प्राप्त करने का संपूर्ण प्रयास करना होता है। मतभेद हो लेकिन मनभेद ना हो। सुरक्षित दूरी का आकलन हमारी बुद्धिमत्ता पर निर्भर करता है।
क्या करें…
हमेशा वर्तमान क्षण में जीने का प्रयास करें और पुराने गड़े मुर्दे कभी भी नहीं उखाड़ें, उसका कभी कोई लाभ नहीं होता है। ज़िद और अहंकार व्यर्थ होते हैं, उसकी वजह से रिश्तों को कभी भी तोड़ें नहीं। अप्रिय स्थिति से स्वयं को बचाते हुए, स्वस्थ वातावरण के निर्माण में सहायक बनें, व्यर्थ की बातों को टालें, न्यूनतम, आवश्यक और पर्याप्त संवाद और व्यवहार करें, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
9406717823
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सोमवार 2 जून 2025
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