आज का चिंतन #278
बंधन और बाधा…
बंधन मन के होते हैं और बाधाएं परिस्थितियों के कारण होती है। मन पर विजय पाना मुश्किल होता है इसीलिए मन के बंधनों को तोड़ना भी कठिन होता है, लेकिन इससे निकलने के उपाय होते हैं। वहीं दूसरी ओर हिम्मत, साहस, जुनून, जोश, दृढ़ता, एकाग्रता, धैर्य, समझदारी, सहयोग इत्यादि से बाधाओं को निश्चित ही पार किया जा सकता है।
बंधन तोड़ो ना…
हमारे सभी बंधन हमारी सोच की सीमाओं के कारण होते हैं। सोच को पर्याप्त विस्तार देकर ही, हम मन के बंधनों को तोड़ कर बाहर निकल सकते हैं। सोच के विस्तार के लिए अध्ययन, प्रयास, प्रयोग, सहयोग, चर्चा, चिंतन, मंथन इत्यादि ही साधन होते हैं जिनसे आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और हम उन्मुक्त होकर अपने प्रयास सघन कर सकते हैं।
स्वीकार्यता और जीवटता
स्थितियां हमारे नियंत्रण में, कभी भी नहीं होती हैं, इसलिए उनके प्रति या लोगों के प्रति, विरोध के भाव हमारी प्रगति की सबसे बड़ी रुकावट बन जाते हैं। परिस्थितियों की सहज स्वीकार्यता, और उसके पश्चात ही, हर एक बाधा को पार करके, आगे बढ़ने की ललक से ही संकल्प शक्ति, जीवटता, अदम्य उत्साह, साहस, क्षमता का उदय होता है।
क्या करें…
विचारों की शक्ति को निरंतर विस्तार दें, सदैव उपाय, समाधान और सफलता की ओर प्रवृत्त हों, उद्यत हों। उत्साह, आत्मविश्वास और ऊर्जा का प्रवाह अटूट रहे, निरंतर रहे, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
9406717823
संपर्क संवाद सृजन समाधान
गुरुवार 15 मई 2025
भोपाल
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