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आज का चिंतन #268
*अपेक्षा और मोह…*
अपेक्षा सदैव दूसरों से होती है कि वह ऐसा करे, या ऐसा नहीं करे, ऐसा बोले या ऐसा नहीं बोले, इस तरह से बोले इत्यादि।
मोह हमारे अंदर उपजता है, व्यक्ति या वस्तुओं के प्रति। मोह के वशीभूत होकर क्रिया या प्रतिक्रिया हमारे द्वारा होती है और उसमें बुद्धि, विवेकशीलता की मर्यादाएं प्रायः भंग होती है।
*परे होना…*
अपेक्षा अथवा मोह से, पूर्ण रूप से परे होना, सामान्यतया लगभग असंभव होता है किंतु इसके लिए विचार, चिंतन और चेतना के गहरे स्तर पर जाकर प्रयास किया जाना निश्चित रूप से संभव होता है।
*आंतरिक प्रक्रिया…*
प्रतिदिन हमें अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं और तदनुसार हमारे विचारों में, हमारी अपेक्षा और मोह के स्तर में भी निरंतर बदलाव होता है। उनके प्रति सजग और सचेत रहकर हम अपनी दिशा निश्चित रूप से तय कर सकते हैं और अपेक्षा और मोह को न्यूनतम स्तर पर ले जा सकते हैं।
*क्या करें..*
दूसरों के व्यवहार से अप्रभावित रहकर, अपने आत्मविश्वास और आत्मसंतुष्टि की अवस्था को प्राप्त करना और स्थितप्रज्ञ होना, यही अभीष्ट होता है।
संजय अग्रवाल
9406717823
*संपर्क संवाद सृजन, समाधान*
बुधवार 16 अप्रैल 2025
नागपुर
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